SMC पुनर्गठन 2026: 15 सदस्यीय विद्यालय प्रबंध समिति का गठन, नियम और समस्त प्रारूप की PDF देखें

उत्तर प्रदेश परिषदीय विद्यालयों में विद्यालय प्रबंध समिति SMC पुनर्गठन 2026 की गाइडलाइन और 15 सदस्यीय समिति की जानकारी
SMC पुनर्गठन 2026 की गाइडलाइन और 15 सदस्यीय समिति की जानकारी
HIGHLIGHTS
  1. वर्तमान समिति का कार्यकाल समाप्त : 30 नवंबर 2026
  2. नई समिति गठन की अवधि : 1 से 30 नवंबर 2026
  3. नई समिति का कार्यभार : 1 दिसंबर 2026

SMC पुनर्गठन 2026: उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में विद्यालय प्रबंध समिति (School Management Committee–SMC) के पुनर्गठन को लेकर शासन ने विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। नई व्यवस्था के तहत प्रदेश के संबंधित प्राथमिक, उच्च प्राथमिक एवं कंपोजिट विद्यालयों में विद्यालय प्रबंध समिति का पुनर्गठन किया जाएगा। इस बार समिति की संरचना से लेकर सदस्यों के चयन, अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के निर्वाचन, बैठकों, वित्तीय प्रबंधन और विद्यालय विकास की जिम्मेदारियों तक के लिए स्पष्ट व्यवस्था निर्धारित की गई है।

शासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रत्येक विद्यालय में कुल 15 सदस्यीय विद्यालय प्रबंध समिति गठित होगी। इसमें 11 सदस्य विद्यालय में अध्ययनरत बच्चों के माता-पिता अथवा अभिभावकों में से चुने जाएंगे। शेष चार सदस्यों में स्थानीय प्राधिकारी द्वारा नामित एक निर्वाचित सदस्य, एक एनजीओ प्रतिनिधि, जिलाधिकारी द्वारा नामित एक लेखपाल तथा विद्यालय के प्रधानाध्यापक अथवा प्रभारी प्रधानाध्यापक शामिल होंगे। प्रधानाध्यापक समिति के पदेन सदस्य सचिव होंगे।

इस पुनर्गठन का उद्देश्य विद्यालयों के प्रबंधन में अभिभावकों और समुदाय की भागीदारी बढ़ाना, बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना, विद्यालय की आधारभूत सुविधाओं में सुधार करना तथा वित्तीय एवं शैक्षिक गतिविधियों में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। शासन ने स्पष्ट किया है कि विद्यालय प्रबंध समिति केवल औपचारिक संस्था नहीं होगी, बल्कि विद्यालय के विकास, बच्चों के अधिगम और जवाबदेह संचालन की महत्वपूर्ण इकाई के रूप में कार्य करेगी।

1 दिसंबर 2026 से SMC का नया कार्यकाल

शासनादेश में निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार वर्तमान विद्यालय प्रबंध समितियों का कार्यकाल 30 नवंबर 2026 को समाप्त होगा। नई समितियों के गठन एवं पुनर्गठन की प्रक्रिया 1 नवंबर से 30 नवंबर 2026 के बीच पूरी की जाएगी। इसके बाद 1 दिसंबर 2026 से नवगठित समितियां कार्यभार ग्रहण करेंगी।

नई समिति का कार्यकाल गठन की तिथि से दो वर्ष निर्धारित किया गया है। शासन ने यह भी निर्देश दिया है कि समिति का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही नई समिति के गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी जाए, ताकि विद्यालय में प्रबंधन संबंधी कार्यों में किसी प्रकार का व्यवधान न आए।

पुनर्गठन से संबंधित महत्वपूर्ण तिथियां:

विवरणनिर्धारित तिथि
वर्तमान समिति का कार्यकाल समाप्त30 नवंबर 2026
नई समिति गठन की अवधि1 से 30 नवंबर 2026
नई समिति का कार्यभार1 दिसंबर 2026
समिति का कार्यकाल2 वर्ष

शासनादेश में यह भी व्यवस्था है कि कार्यकाल के 23 माह पूरे होने पर नई समिति के गठन की कार्यवाही प्रारंभ कर दी जाएगी, ताकि 24 माह पूरे होने से पहले नई समिति का गठन सुनिश्चित किया जा सके। आम चुनाव, महामारी, प्राकृतिक आपदा अथवा अन्य अपरिहार्य परिस्थितियों में निर्धारित समय पर गठन संभव नहीं होने पर स्थिति सामान्य होने पर नई समिति गठित की जाएगी। तब तक पूर्व समिति कार्य करती रहेगी।

एक ही परिसर में संचालित प्राथमिक, उच्च प्राथमिक एवं कंपोजिट विद्यालयों के लिए एक ही विद्यालय प्रबंध समिति गठित की जाएगी।

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विद्यालय प्रबंध समिति (SMC) की संरचना

शासनादेश के पृष्ठ संख्या 3 में समिति की सदस्य संख्या और संरचना स्पष्ट की गई है। इसके अनुसार विद्यालय प्रबंध समिति में कुल 15 सदस्य होंगे। इनमें सबसे अधिक प्रतिनिधित्व अभिभावकों को दिया गया है, जिससे विद्यालय के निर्णयों में बच्चों के माता-पिता की सीधी भागीदारी बनी रहे।

समिति की सदस्य संरचना इस प्रकार होगी:

सदस्य की श्रेणीसंख्या
अभिभावक सदस्य11
स्थानीय प्राधिकारी का एक निर्वाचित सदस्य (नामित)1
एक एनजीओ प्रतिनिधि1
जिलाधिकारी द्वारा नामित एक लेखपाल1
प्रधानाध्यापक/प्रभारी प्रधानाध्यापक1
कुल सदस्य15

अभिभावक सदस्यों का चयन विद्यालय में अध्ययनरत बच्चों के माता-पिता अथवा अभिभावकों में से किया जाएगा। चयन के दौरान प्रत्येक कक्षा का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा। साथ ही कम से कम 50 प्रतिशत अभिभावक सदस्य महिलाएं होंगी। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं कमजोर वर्ग का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया जाएगा।

इस व्यवस्था से समिति में अलग-अलग सामाजिक वर्गों, कक्षाओं और महिला अभिभावकों की भागीदारी सुनिश्चित होगी।

अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव कैसे होगा?

विद्यालय प्रबंध समिति अपने अभिभावक सदस्यों में से अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का निर्वाचन करेगी। शासन ने महिला प्रतिनिधित्व को अनिवार्य बनाते हुए स्पष्ट किया है कि अध्यक्ष अथवा उपाध्यक्ष के पदों में से कम से कम एक पद पर महिला का होना आवश्यक होगा। इसका उद्देश्य विद्यालय प्रबंधन के नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करना है।

प्रधानाध्यापक होंगे समिति के सदस्य सचिव

समिति में प्रधानाध्यापक अथवा प्रभारी प्रधानाध्यापक पदेन सदस्य सचिव होंगे। उनके ऊपर समिति के गठन और संचालन से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां रहेंगी।

शासनादेश के अनुसार सदस्य सचिव के प्रमुख दायित्व होंगे:

  • समिति गठन की प्रक्रिया संपन्न कराना।
  • बैठकों की सूचना जारी करना।
  • कार्यवृत्त पंजिका (Minutes Register) संधारित करना।
  • वित्तीय एवं प्रशासनिक अभिलेख सुरक्षित रखना।
  • समिति के निर्णयों का अनुपालन सुनिश्चित करना।
  • सदस्यों का अभिमुखीकरण एवं क्षमता संवर्धन कराना।
  • अभिलेखों का अद्यतन रखरखाव करना।
  • प्रत्येक माह कम से कम एक बार विद्यालय प्रबंध समिति की बैठक आयोजित कराना।

इससे विद्यालय में होने वाले निर्णयों और विकास कार्यों का नियमित रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा।

विद्यालय प्रबंध समिति का गठन कैसे होगा?

शासन ने समिति के गठन को पारदर्शी बनाने के लिए जिला, विकासखंड और विद्यालय स्तर पर अलग-अलग जिम्मेदारियां निर्धारित की हैं।

जिला स्तर पर जिलाधिकारी की जिम्मेदारी

  • जिलाधिकारी जनपद स्तर पर संपूर्ण प्रक्रिया के प्रभारी होंगे।
  • प्रत्येक विकासखंड के लिए नोडल अधिकारी नामित किए जाएंगे।
  • विद्यालयवार खुली बैठक का कैलेंडर तैयार किया जाएगा।

विकासखंड स्तर पर खंड शिक्षा अधिकारी की जिम्मेदारी

  • खंड शिक्षा अधिकारी व्यापक प्रचार-प्रसार सुनिश्चित करेंगे।
  • प्रत्येक विद्यालय के लिए निर्वाचन पर्यवेक्षक नामित किया जाएगा।
  • आवश्यकता के अनुसार न्याय पंचायतवार कार्यक्रम आयोजित किए जा सकेंगे।

विद्यालय स्तर पर गठन की प्रक्रिया

विद्यालय में अभिभावकों को बैठक की सूचना दी जाएगी और खुली बैठक के माध्यम से समिति के चयन की प्रक्रिया पूरी होगी।

गठन के दौरान निम्नलिखित नियमों का पालन करना होगा:

  1. समिति का चयन खुली बैठक में किया जाएगा।
  2. कुल अभिभावकों में कम से कम 50 प्रतिशत की उपस्थिति आवश्यक होगी।
  3. चयन के लिए सर्वसम्मति का प्रयास किया जाएगा।
  4. सहमति नहीं बनने पर हाथ उठाकर मत लिया जाएगा।
  5. विवाद की स्थिति में खंड शिक्षा अधिकारी द्वारा गोपनीय मतदान कराया जाएगा।
  6. संपूर्ण कार्यवाही बैठक पंजिका में दर्ज की जाएगी।

इस प्रकार समिति का गठन पारदर्शी एवं निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाएगा।

किन परिस्थितियों में समाप्त होगी सदस्यता?

समिति के सदस्यों की सदस्यता कुछ निर्धारित परिस्थितियों में समाप्त मानी जाएगी। शासनादेश में इसके लिए स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं।

सदस्यता समाप्त होने की परिस्थितियां:

  • सदस्य की मृत्यु होने पर।
  • न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि होने पर।
  • स्थायी रूप से स्थान परिवर्तन करने पर।
  • लगातार चार बैठकों में बिना सूचना अनुपस्थित रहने पर।
  • संबंधित सदस्य के बच्चे का विद्यालय छोड़ देने पर।

यदि किसी सदस्य का पद रिक्त हो जाता है तो 50 प्रतिशत कोरम वाली खुली बैठक में नए सदस्य का चयन किया जाएगा। आवश्यकता के अनुसार बैंक खाते एवं संबंधित अभिलेखों में भी संशोधन कराया जाएगा।

विद्यालय प्रबंध समिति (SMC) की जिम्मेदारी

नई व्यवस्था में विद्यालय प्रबंध समिति को विद्यालय के शैक्षिक और समग्र विकास की आधारभूत इकाई माना गया है। समिति का काम केवल भवन, शौचालय या मध्याह्न भोजन की निगरानी करना नहीं होगा, बल्कि बच्चों के सीखने के स्तर, नियमित उपस्थिति, नामांकन, समावेशी शिक्षा और विद्यालय के शैक्षिक परिणामों में सुधार के लिए भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

शासनादेश के अनुसार समिति के कार्यों को 17 प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित किया गया है।

1. ECCE एवं प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा: 3 से 8 वर्ष तक के बच्चों के लिए सुरक्षित, पोषणयुक्त, खेल आधारित एवं गतिविधि आधारित अधिगम वातावरण उपलब्ध कराने में सहयोग करना। आंगनबाड़ी केंद्रों और विद्यालयों के बीच समन्वय स्थापित कर बच्चों को स्कूल रेडीनेस का अनुभव दिलाना।

2. शत-प्रतिशत नामांकन और उपस्थिति: विद्यालय में सभी पात्र बच्चों का नामांकन सुनिश्चित करना तथा उनकी नियमित उपस्थिति और विद्यालय में ठहराव पर ध्यान देना। विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की पहचान कर उन्हें दोबारा शिक्षा से जोड़ने के प्रयास करना।

3. निपुण भारत मिशन एवं FLN: बच्चों में आधारभूत साक्षरता एवं संख्याज्ञान विकसित करने के लिए विद्यालय के प्रयासों की समीक्षा करना। निपुण भारत मिशन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में शिक्षकों और अभिभावकों को सहयोग देना।

4. गुणवत्तापूर्ण शिक्षण-अधिगम: गतिविधि आधारित शिक्षण, पुस्तकालय, खेल, परियोजना आधारित अधिगम, प्रयोगात्मक कार्य और बच्चों के सीखने के परिणामों में सुधार को प्रोत्साहित करना।

5. शिक्षक सहभागिता एवं उत्तरदायित्व: शिक्षकों की नियमित उपस्थिति, शैक्षणिक अनुशासन और प्रभावी शिक्षण गतिविधियों में सहयोग करना। अभिभावक-शिक्षक संवाद को बढ़ावा देना।

6. विद्यालय विकास योजना (SDP): आगामी तीन वर्षों की विद्यालय विकास योजना तैयार करने में सहयोग करना। इसमें नामांकन, शैक्षिक रणनीति, शिक्षक आवश्यकता, अतिरिक्त कक्षा-कक्ष, पेयजल, शौचालय, फर्नीचर, डिजिटल संसाधन और पुस्तकालय जैसी जरूरतें शामिल होंगी।

7. विद्यालय रिपोर्ट कार्ड: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप विद्यालय रिपोर्ट कार्ड, UDISE+ और उपलब्ध शैक्षिक आंकड़ों की समीक्षा करना तथा सुधारात्मक निर्णय लेना।

8. आधारभूत संरचना एवं सुरक्षित परिसर: भवन सुरक्षा, पेयजल, शौचालय, बिजली, फर्नीचर, पुस्तकालय, खेल मैदान और दिव्यांग बच्चों के लिए आवश्यक सुविधाओं की निगरानी करना।

9. मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता: बच्चों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता, मात्रा, स्वच्छता, पोषण और नियमित वितरण पर निगरानी रखना।

10. स्वास्थ्य, पोषण एवं स्वच्छता: विद्यालय की स्वच्छता, स्वास्थ्य परीक्षण, पोषण जागरूकता, स्वच्छ पेयजल और सुरक्षित वातावरण को बढ़ावा देना।

11. समावेशी शिक्षा एवं समान अवसर: दिव्यांग बच्चों, बालिकाओं, कमजोर वर्गों और वंचित समुदायों के बच्चों के लिए समान शैक्षिक अवसर सुनिश्चित करने में सहयोग करना।

12. बाल अधिकार एवं बाल संरक्षण: बच्चों को सुरक्षित वातावरण देना तथा शारीरिक दंड, मानसिक उत्पीड़न, भेदभाव और असुरक्षित व्यवहार की रोकथाम में सहयोग करना।

13. अभिभावक एवं सामुदायिक सहभागिता: विद्यालय और समुदाय के बीच समन्वय बढ़ाना तथा अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना।

14. सामाजिक उत्तरदायित्व एवं जनभागीदारी: स्थानीय समुदाय और सामाजिक संगठनों के सहयोग से विद्यालय विकास गतिविधियों को आगे बढ़ाना।

15. सामुदायिक संस्थाओं का उपयोग: पुस्तकालय, खेल सुविधाओं तथा अन्य स्थानीय संसाधनों का उपयोग बच्चों के शैक्षिक विकास के लिए करना।

16. नवाचार, जीवन कौशल एवं व्यावसायिक शिक्षा: विज्ञान एवं गणित मेले, खेलकूद, कला, परियोजना कार्य, कौशल आधारित गतिविधियों और पूर्व-व्यावसायिक अनुभव को प्रोत्साहित करना।

17. शासन की योजनाओं का क्रियान्वयन: स्कूल चलो अभियान, निपुण भारत मिशन, स्वच्छ विद्यालय, समावेशी शिक्षा और शिक्षा विभाग की अन्य योजनाओं के क्रियान्वयन में सहयोग करना।

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SMC के अंतर्गत गठित होंगी पांच उपसमितियां

विद्यालय प्रबंध समिति के कार्यों को व्यवस्थित ढंग से पूरा कराने के लिए शासनादेश में पांच उपसमितियों का प्रावधान किया गया है। इनके माध्यम से विद्यालय के अलग-अलग कार्यक्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

दूसरी टेबल (SMC की पांच उपसमितियां) बिना क्रम संख्या के इस प्रकार रखें:

उपसमितिप्रमुख कार्य
शैक्षिक गुणवत्ता उपसमितिबच्चों की पढ़ाई एवं अधिगम स्तर में सुधार
आधारभूत संरचना उपसमितिविद्यालय भवन एवं सुविधाओं की निगरानी
बाल सुरक्षा एवं समावेशन उपसमितिबाल अधिकार और समान अवसर
आवश्यक कार्य एवं गतिविधियों संबंधी उपसमितिविद्यालय की जरूरी गतिविधियों में सहयोग
सामुदायिक सहभागिता उपसमितिअभिभावकों एवं समुदाय की भागीदारी

विद्यालय के वित्तीय प्रबंधन में भी होगी SMC की भूमिका

विद्यालय प्रबंध समिति को विद्यालय की वित्तीय व्यवस्था में पारदर्शिता बनाए रखने की जिम्मेदारी भी दी गई है। समिति को प्राप्त धनराशि के उपयोग, व्यय अभिलेखों, बैंक खाते और वित्तीय गतिविधियों का विधिवत संधारण करना होगा।

शासनादेश के अनुसार:

  • विद्यालय प्रबंध समिति का बैंक खाता संचालित किया जाएगा।
  • अध्यक्ष एवं सदस्य सचिव संयुक्त हस्ताक्षरकर्ता होंगे।
  • वित्तीय लेन-देन लागू PFMS एवं SNA/SNA-SPARSH व्यवस्था के अनुसार होगा।
  • सभी लेन-देन का अभिलेखीकरण किया जाएगा।
  • वित्तीय पारदर्शिता और सामाजिक अंकेक्षण सुनिश्चित किया जाएगा।

इस व्यवस्था का उद्देश्य विद्यालय को प्राप्त सरकारी धनराशि का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के लिए करना और खर्च से संबंधित जवाबदेही बनाए रखना है।

निर्माण कार्य में विद्यालय प्रबंध समिति की भूमिका

विद्यालयों में निर्माण कार्यों को लेकर भी शासनादेश में अलग व्यवस्था निर्धारित की गई है। इसके अनुसार ₹30 लाख तक के निर्माण कार्य विद्यालय प्रबंध समिति द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत कराए जा सकते हैं।

निर्माण कार्यों में गुणवत्ता, पारदर्शिता और तकनीकी मानकों का पालन आवश्यक होगा। इसके लिए निर्माण कार्य व्यवस्था उपसमिति का गठन किया जाएगा।

निर्माण कार्यों से संबंधित प्रमुख निर्देश:

  • निर्माण कार्य विद्यालय की आवश्यकता के अनुसार प्रस्तावित किए जाएंगे।
  • कार्यों में गुणवत्ता एवं मानकों का पालन आवश्यक होगा।
  • निर्माण सामग्री की गुणवत्ता और कार्य की प्रगति की निगरानी की जाएगी।
  • खर्च एवं निर्माण से संबंधित अभिलेख सुरक्षित रखे जाएंगे।
  • तकनीकी आवश्यकता होने पर संबंधित अधिकारियों से सहयोग लिया जा सकेगा।

SMC सदस्यों का अभिमुखीकरण एवं प्रशिक्षण

नई समिति के गठन के बाद सदस्यों को उनके अधिकारों, दायित्वों और कार्यप्रणाली की जानकारी देना भी आवश्यक होगा। शासनादेश के अनुसार समिति गठन के एक माह के भीतर सदस्यों का अभिमुखीकरण एवं क्षमता संवर्धन प्रशिक्षण आयोजित किया जाएगा।

प्रशिक्षण में मुख्य रूप से निम्नलिखित विषय शामिल होंगे:

  • RTE Act 2009 एवं राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020।
  • विद्यालय प्रबंधन समिति की संरचना एवं कार्य।
  • निपुण भारत मिशन और FLN।
  • विद्यालय विकास योजना।
  • वित्तीय प्रबंधन एवं पारदर्शिता।
  • बाल अधिकार एवं बाल संरक्षण।
  • समावेशी शिक्षा।
  • विद्यालय की आधारभूत सुविधाएं और शैक्षिक गुणवत्ता।

इस प्रशिक्षण का उद्देश्य यह है कि समिति के सभी सदस्य केवल औपचारिक सदस्य बनकर न रहें, बल्कि विद्यालय के विकास में अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए सक्रिय योगदान दें।

SMC पुनर्गठन की निगरानी

समिति गठन की पूरी प्रक्रिया को समयबद्ध एवं पारदर्शी बनाने के लिए शासन ने जिला और विकासखंड स्तर पर अधिकारियों की जिम्मेदारी भी निर्धारित की है।

  • जिलाधिकारी: जनपद स्तर पर संपूर्ण प्रक्रिया के प्रभारी होंगे।
  • नोडल अधिकारी: प्रत्येक विकासखंड में नामित किए जाएंगे।
  • खंड शिक्षा अधिकारी: प्रचार-प्रसार और गठन प्रक्रिया के पर्यवेक्षण की जिम्मेदारी निभाएंगे।
  • निर्वाचन पर्यवेक्षक: प्रत्येक विद्यालय के लिए नामित किया जाएगा।
  • प्रधानाध्यापक: विद्यालय स्तर पर खुली बैठक, सदस्य चयन, अभिलेख एवं समिति गठन की प्रक्रिया पूरी कराएंगे।

प्रधानाध्यापकों और अभिभावकों के लिए निर्देश

विद्यालय प्रबंध समिति का पुनर्गठन निर्धारित समय में पूरा कराने के लिए विद्यालय स्तर पर सभी आवश्यक तैयारियां करना जरूरी है। प्रधानाध्यापकों को अभिभावकों को समय से बैठक की जानकारी देनी होगी और समिति गठन की प्रक्रिया को शासनादेश के अनुसार पूरा कराना होगा।

अभिभावकों को भी यह समझना आवश्यक है कि SMC केवल नामित सदस्यों की सूची नहीं है, बल्कि विद्यालय के विकास और बच्चों की शिक्षा से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इसलिए समिति में चयनित प्रत्येक सदस्य को बैठकों में नियमित भाग लेना और विद्यालय के हित में सक्रिय सहयोग करना चाहिए।

निष्कर्ष

विद्यालय प्रबंध समिति का यह पुनर्गठन उत्तर प्रदेश की परिषदीय शिक्षा व्यवस्था में अभिभावकों और समुदाय की भागीदारी को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। 15 सदस्यीय समिति में 11 अभिभावक प्रतिनिधियों को शामिल करने, महिलाओं का कम से कम 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने, पांच उपसमितियां गठित करने तथा विद्यालय विकास योजना और वित्तीय प्रबंधन को समिति से जोड़ने का उद्देश्य विद्यालयों को अधिक जवाबदेह और प्रभावी बनाना है।

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अब सभी संबंधित विद्यालयों को 30 नवंबर 2026 तक पुनर्गठन की प्रक्रिया पूरी कर 1 दिसंबर से नई समिति का संचालन सुनिश्चित करना होगा। प्रधानाध्यापकों, शिक्षकों, खंड शिक्षा अधिकारियों और अभिभावकों की संयुक्त सहभागिता ही इस व्यवस्था को सफल बना सकती है।

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