प्रभारी प्रधानाध्यापकों को कार्यभार संभालने की तारीख से ही मिलेगा पूरा वेतन एरियर, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रभारी प्रधानाध्यापक वेतन एरियर आदेश

​उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में बतौर प्रभारी/कार्यवाहक प्रधानाध्यापक (Officiating Headmaster) सेवाएं दे रहे शिक्षकों के पक्ष में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने स्पष्ट किया है कि प्रभारी प्रधानाध्यापक के रूप में कार्य करने वाले शिक्षक उस पद के वेतन और एरियर के पूरी तरह हकदार हैं। अदालत ने यह राहत याचिका दाखिल करने की तारीख से महज तीन साल पहले तक सीमित रखने की पुरानी बंदिश को खारिज करते हुए निर्देश दिया है कि शिक्षकों को उनके कार्यभार संभालने की वास्तविक तिथि से ही पूरा एरियर दिया जाए।

क्या था पूरा मामला

पूनम रानी वार्ष्णेय समेत सैकड़ों शिक्षकों की याचिकाओं (Writ-A No. 9410/2026 व अन्य) में यह मांग उठाई गई थी कि वे नियमित प्रधानाध्यापक की अनुपस्थिति में लंबे समय से कार्यवाहक प्रधानाध्यापक की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें प्रधानाध्यापक पद का वेतन नहीं दिया जा रहा था। इससे पहले ‘त्रिपुरारी दुबे’ मामले में एकल पीठ ने संपूर्ण सेवा अवधि का एरियर देने का आदेश दिया था। हालांकि, राज्य सरकार की अपील पर डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के ‘तारसेम सिंह’ (Tarsem Singh) फैसले का हवाला देते हुए एरियर के भुगतान को याचिका दाखिल करने से अधिकतम तीन वर्ष पूर्व तक ही सीमित कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले ने बदली कानूनी स्थिति

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ‘माया बनर्जी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ (20 अगस्त 2026) का हवाला दिया। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया था कि ‘तारसेम सिंह’ मामले में पूर्व के ‘एस.के. मस्तान बी’ (S.K. Mastan Bee) निर्णय पर विचार नहीं किया गया था, इसलिए वह निर्णय ‘पर इन्क्युरियम’ (Per Incuriam) की श्रेणी में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी व्यवस्था दी थी कि वैध देयकों को केवल देरी के आधार पर तीन साल तक सीमित करना अनुचित है।

वेतन भी पेंशन और ग्रेच्युटी की तरह कर्मचारी की संपत्ति

राज्य सरकार के वकीलों का तर्क था कि पेंशन के सिद्धांत को वेतन पर लागू नहीं किया जा सकता और डिवीजन बेंच का तीन साल वाला आदेश बाध्यकारी है। इस दलील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जिस तरह पेंशन और ग्रेच्युटी एक कर्मचारी की संपत्ति होती है, ठीक उसी तरह सेवा देने वाले शिक्षक का वेतन भी उसकी कानूनी संपत्ति है। कोर्ट ने माना कि जब डिवीजन बेंच के आदेश का मुख्य आधार (तारसेम सिंह निर्णय) ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा अमान्य हो चुका है, तो तीन साल का प्रतिबंध अब लागू नहीं रह सकता।

अदालत का अंतिम निर्देश

हाईकोर्ट ने त्रिपुरारी दुबे मामले में डिवीजन बेंच द्वारा तय अन्य सभी शर्तों को बरकरार रखते हुए केवल 3 साल के प्रतिबंध वाले बिंदु को संशोधित कर दिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि सभी याचिकाकर्ता उस मूल तारीख से प्रधानाध्यापक पद के वेतन और एरियर के हकदार होंगे, जिस दिन से उन्होंने वास्तव में कार्यवाहक प्रधानाध्यापक के तौर पर काम शुरू किया था। इस फैसले से उत्तर प्रदेश के उन हजारों सहायक अध्यापकों को बड़ी वित्तीय राहत मिलेगी, जो वर्षों से प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों में प्रधानाध्यापक की दोहरी जिम्मेदारी संभाल रहे थे। 

📚 इसे भी देखें:

शेयर करें
WHATSAPP